दो घूंट पानी के सहारे तय करते थे 20 कदम का सफर, जानिए इनके दर्द के बारे में...

हरदोई रायबरेली के प्रेमचंद्र ने भाई हरिश्चंद्र के साथ आने वाला कल बेहतर बनाने के लिए कुछ साल पहले दिल्ली का रुख किया था। दिल्ली की एक कपड़ा फैक्टरी में दोनों भाई सिलाई कारीगर बन गए तो रायबरेली के कुछ और लोगों ने भी दिल्ली का रुख किया। एनसीआर के उद्योगों में वे भी काम पर लग गए। कोरोना वायरस के डर से उठे तूफान के झटके ने न सिर्फ सबको रोजगार से पैदल कर दिया बल्कि मय परिवार 90 किलोमीटर पैदल चलने को भी मजबूर किया।
यह हालात बयां करते प्रेमचंद्र की आंखें भर आईं। वह भाई हरिश्चंद्र, भाभी निशा के साथ हरदोई के सिनेमा चौराहे के निकट एक बंद दुकान के बाहर फुटपाथ पर बैठे थे। रायबरेली के ही महेश और उनकी पत्नी कुसुम, दीप व पवन भी साथ थे। प्रेमचंद्र ने बताया कि दिल्ली से हरदोई तक का सफर लगभग 24 घंटे में तीन जगह मिले अलग-अलग मालवाहक वाहनों के सहारे पूरा हो सका।

किस्तों में कुछ-कुछ दूरी का सफर कराने वाले वाहनों में रिरियाकर जगह बनाई, लेकिन फिर भी उनके अहसानमंद हैं। दो स्थानों पर मिली इन गाड़ियों ने पद यात्रा की दूरी घटा दी। साथ ही उनमें पीठ टिकाकर उंघने और झपकी लेने से नींद का काम चलाया। इन वाहनों की मदद के अलावा दिल्ली से हरदोई तक लगभग 90 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। बच्चों और सामान के झोलों के साथ यह पदयात्रा पहाड़ चढ़ने जैसी महसूस हो रही थी।

साथ मौजूद दो महिलाएं तो टुकड़ों में में भी इतना पैदल नहीं चली थीं। खाने के नाम पर थोड़ा सा लइया-चना पास था, जो कुछ दूरी बाद तय करने पर ही खत्म हो गया। इसके बाद जगह-जगह पानी की बोतल भरते और दो-दो घूंट भरकर एक बार में लगभग 20 कदम (करीब आठ-दस मीटर) की दूरी तय करते। रास्ते में पुलिस के दोनों रूप देखने को मिले। कहीं दुत्कार तो कहीं समझाने और आराम करके आगे बढ़ने की नसीहत मिली। सफर की चुनौतियों के अलावा दिल्ली में भी कम दुश्वारी नहीं झेलीं। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के दिन से फैक्टरी में ताला पड़ा तो खुला नहीं। घर (रायबरेली) जाने का सोचा तो निकलने नहीं दिया। बाद में दिल्ली छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया। प्रेमचंद्र और उनके साथ मौजूद सभी ने एक स्वर से कहा कि अच्छा होता कि सरकार जनता कर्फ्यू के एलान के साथ मजदूरों को घर जाने की घोषणा भी कर देती।

ऐसा होता तो लॉकडाउन में सड़कों पर इतनी भीड़ नजर नहीं आती। ना ही लोगों को धक्के खाने पड़ते। हरदोई में स्वयंसेवियों से मिले फल और पूड़ी-सब्जी खाकर ये लोग बोले तसल्ली रायबरेली पहुंचकर ही मिलेगी। उम्मीद करते हैं कि बाकी सफर में भी गाड़ी वालों की मेहरबानी मिल जाएगी। वरना अब तक की पदयात्रा से मिला तजुर्बा धीरे-धीरे कदमों को अपने ठिकाने तक पहुंचा देगा। हरिश्चंद्र ने भूख काबू कर ली। दो-दो घूंट पानी से प्यास बुझाते रहे, लेकिन शौचालय की जरूरत तो टाली नहीं जा सकती थी। मजबूरी में क्या महिला, क्या पुरुष न चाहते हुए खुले में पेशाब और शौच की जगह तलाशनी पड़ी।
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