कोरोना का कहर "हम तो एक टाइम खा लेते हैं लेकिन बच्चों को कैसे समझाएं"

आठ दिन से रोजगार नहीं है,अब मकान मालिक भी किसी न किसी बहाने डांटने पर उतारू रहता है। सुबह तो दानदाता खाना खिला देते हैं लेकिन रात को क्या खाएं। हम तो जैसे तैसे रात काट लेते हैं लेकिन बच्चों को कैसे समझाएं। इसलिए बस मिले या नहीं लेकिन पैदल ही अपने घर चले जाएंगे। 
दुर्गापुरा बस स्टेंड पर अपने घर कोटा की बस का इंतजार कर कर रहे मजदूर महेश ही नहीं कई मजदूरों की ऐसी ही कहानी है। महेश के साथ कई मजदूर साथी लालकोटी सब्जी मंडी में वर्षों से काम कर रहे है। लेकिन अब मंडी बंद तो रोजगार भी खत्म। पहले सोचा दस दिन कैसे भी निकाल लेंगे। लेकिन अब 14 अप्रेल के बाद भी भरोसा नहीं कि हालात सामान्य होंगे। 

दानदाता हम जैसे मजदूरों को खाना खिला रहे हैं। हम एक टाइम खा कर गुजारा कर लेते हैं। लेकिन शाम होते ही बच्चे फिर से खाना मांगते हैं। क्या खिलाएं उनको। किसी तरह से उनको चुप करा कर सुला देते हैं। अब सोच लिया है कि पैदल ही गांव चले जाएंगे। वहां कम से कम दो वक्त का खाना तो मिल सकेगा।
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