कोरोना मृतकों की हो रही ऐसी दुर्दशा! हिंदू हो या मुस्लिम कोई नहीं कंधा देने वाला...

कोरोना वायरस का खौफ इस कदर लोगों में छा गया है कि अब इस बीमारी से मरने वाले लोगों की शव यात्रा में लोग नहीं जा रहे। कोरोना वायरस के चलते घरवाले मृतक को चुपचाप अस्पताल या घर से श्मशान ले जाते हैं। श्मशान के रास्ते में श्मशान घाट तक शोक मनाने वालों का हुजूम नहीं दिखता है। इतना ही नहीं बल्कि कई एम्बुलेंस वाले तक अपनी गाड़ी शवों को ढोने के लिए तैयार नहीं।
कोरोना के चलते हुए लॉकडाउन ने अवशेषों के निर्यात को भी प्रभावित किया है। इतना ही नहीं बल्कि अब अंतिम संस्कार का समय की अब घट गया है। पहले करीब 6 घंटे तक चलने वाला समारोह में अब एक घंटे से भी कम समय लगता है। अंतिम संस्कार के वक्त वायरस का फैलने का डर भी लोगों का सता रहा है। अंतिम संस्कार कराने वालों ने बुकिंग लेना पूरी तरह से बंद कर दिया है क्योंकि यह 'बहुत जोखिम भरा' है। इतना ही नहीं बल्कि अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले पंडित मास्क पहनते हैं और समारोह के दौरान मृतक के परिवार को नहीं छूते हैं। 

ऐसा ही हाल मुस्लिमों के होने वाले अंतिम संस्कार का है। शव को कब्रिस्तान में ले जाने से पहले मुस्लिम, अंतिम संस्कार के जुलूस को मस्जिद के बाहरी हिस्से रखकर नमाज पड़ता हैं। लेकिन मस्जिदों पर ताला लगा दिया गया है। इसलिए नमाज़ को घर पर ही पढ़ा जाना चाहिए। माहिम मुस्लिम कब्रिस्तान के प्रशासन अधिकारियों का कहना है कि एक सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, मृतक के साथ कब्रिस्तान में 20 से अधिक लोगों को जाने की अनुमति नहीं है। जीवित रहने के लिए ताबूत और स्ट्रेचर ले जाने वाले हाथ भी दुर्लभ हैं। लोग कोरोना से मृतकों के शव तक को ढोने को तैयार नहीं हो रहे। ऐसे में यह भयावह स्थित उत्पन्न हो चुकी है।
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