लॉकडाउन तोडऩे की अपेक्षा अच्छा है अपना पेशा ही बदलना....

मजबूरी इंसान से क्या कुछ नहीं करा देते हैं, लेकिन इंसान अगर हालात से लडऩा सीख जाए तो बड़े से बड़ा काम आसानी से हो जाता है। जीवन में एक रास्ता बंद होता है तो दूसरा खुद व खुद खुल जाता है, जरूरी है कि इंसान खुद को कमजोर और असाहय नहीं समझे। कोरोना वायरस के संक्रमण के खतरे से पैदा हुई एक बुलंद हौंसले और जज्बे से जुड़ी ऐसी ही कहानी है शहर के पुराना बस स्टैंड निवासी सोहन चौरसिया की। 38 वर्षीय सोहन चौरसिया शहर में ऑटो चलाकर अपने परिवार का पेट पालते हैं। सोहन चौरसिया के घर में पत्नी और दो बच्चे हैं। 
माता-पिता ने अलग कर दिया है, लेकिन इनके हिस्से में मकान नहीं आया है। यह माता-पिता के मकान में रहते हैं, लेकिन हर महीने मकान का किराया देते हैं। बेटा आयुष चौरसिया कक्ष 10वीं और बेटी रूबल चौरसिया 12वीं क्लास में पढ़ती है, ऑटो से जो कमाते हैं, वह परिवार के भरण पोषण और बच्चों की पढ़ाई कर खर्च जाता है। बचत के नाम पर कोई जमा पूंजी नहीं है। ऐसे में कोरोना वायरस के संक्रमण को लेकर 22 मार्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता कफ्र्यू को अपील की तो सोहन को कुछ नहीं लगा, सोचा एक दिन की बात है, लेकिन जब इसके बाद लगातार 15 अप्रैल तक लॉकडाउन की घोषणा हुई तो युवक सख्ते में आ गया।

तीन दिन जैसे-तैसे इधर-उधर से जुगाड़ कर घर चलाया, लेकिन फिर सोचा कि ऑटो निकाल कर एक-दो सवारी इधर-उधर छोड़ दूं, लेकिन लॉकडाउन का उल्लंघन होगा। एक तरफ लॉकडाउन और दूसरी तरफ घर की रोजी-रोटी का संकट, ऐसे में सोहन चौरसिया ने तय किया कि ऑटो चलाने के बजाय कुछ दिन पेशा बदलकर सब्जी का ठेला लगाएगा और तय समय पर जोन के हिसाब से सब्जी बेचकर अपने घर का खर्चा उठाएगा। सोहन ने बताया कि उसने मंडी से 800 रुपए की सब्जी खरीदी और बाजार में 1200 रुपए की बिकी है। एक दिन में 300 रुपए का मुनाफा कमाया है, इस तरीके से वह बीते तीन दिन से खुशी-खुशी लॉकडाउन का पालन कर अपना घर चला रहा है। सोहन का तर्क है कि विकल्प खोजे जाएं तो कभी नहीं है, बस हमें खुद को तैयार करना होता है।
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