लॉकडाउन हुआ तो बेटे को कंधे पर बिठाकर नाप दिया 500 KM की दूरी, और फिर घर पहुंचने की खुशी

दरअसल, दयाराम कुशवाहा और उनकी पत्नी ज्ञानवती दिल्ली में ऊंची इमारतों के निर्माण में ईंट ढोने का काम करते थे. इस दौरान उनका 5 साल का बेटा वहीं पर धूल में खेला करता था. लेकिन जब कोरोना वायरस की वजह से देश में लॉकडाउन किया गया तो परिवार पर मुसीबत का बोझ आ गिरा. फिर 26 मार्च को सभी लोग दिल्ली से 500 किमी दूर अपने गांव के लिए पैदल ही चल पड़े.
28 साल के दयाराम करीब 500 किमी लंबे रास्ते में 5 साल के बेटे शिवम को कंधे पर उठाए रहे. आखिरकार चार दिनों तक लगातार चलने और कुछ ट्रक में लिफ्ट लेने के बाद वे मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के अपने गांव जुगया पहुंचने में सफल रहे.
लॉकडाउन के बाद दयाराम को काम मिलना बंद हो गया था और परिवार के लिए खाने का इंतजाम करना और रेंट देना मुश्किल था. रास्ते में जब पैदल चलने में मुश्किल होने लगी तो दयाराम अपने 7 साल के दूसरे बेटे को याद करने लगे जिसे उन्होंने गांव में ही छोड़ दिया था. गांव में दयाराम का 2 कमरों का पक्का मकान है. दिलचस्प बात है कि उनके घर में एक सुंदर सा पोस्टर लगा है जिस पर लिखा है- 'मैं समय को पीछे ले जाना चाहता हूं जब लोग छोटे से गांव में रहा करते थे और एक दूसरे का ख्याल रखते थे.'
दयाराम ने बताया - ऐसा नहीं है कि मैं दिल्ली से प्यार करता हूं. मुझे जीने के लिए पैसे की जरूरत है. अगर हमारे पास गांव में पैसे होते तो हमलोग यहीं रहते. यह हमारा घर है. वहीं, दयाराम और दिल्ली से गांव पहुंचे अन्य लोगों को इस बात का डर है कि उनके पुराने दोस्त उन पर शक ना करने लगें कि कहीं हमलोग संक्रमण फैला देंगे. दयाराम का कहना है कि कोरोना वायरस की त्रासदी ने उन्हें अपने ही गांव में बाहरी व्यक्ति बना दिया है.
हालांकि, गांव पहुंचने के कुछ दिनों बाद दयाराम, ज्ञानवती और अन्य रिश्तेदारों को गेहूं की कटाई का काम मिल गया. तीन दिनों में इन लोगों ने आधा टन गेहूं की कटाई की, लेकिन पेमेंट नहीं मिला. बाद में सिर्फ 50 किलो गेहूं मजदूरी के तौर पर दिया गया. परिवार के पास फिलहाल सब्जी के लिए आलू मौजूद है. लेकिन डर है कि आलू खत्म होने के बाद सभी लोगों को सिर्फ रोटी खाकर रहना होगा.
वहीं आमतौर से दिल्ली में दयाराम का परिवार हर महीने 8 हजार रुपये तक बचा लेता था. वे इस पैसे को घर भेज देते थे क्योंकि मां-पापा और एक बेटा गांव में रहता था और कर्ज की किस्त भी देनी होती थी. दयाराम का कहना है कि उन्हें फिर से कर्ज लेना होगा. कर्ज देने वाले स्थानीय लोग हर महीने 3 फीसदी ब्याज लेते हैं जिसकी वजह से काफी अधिक पैसा उन्हें लौटाना पड़ता है.