लॉकडाउन : मजदूरों के लिए मसीहा बन गया कोटा का एक परिवार, घर के बाहर लगती है 600 मीटर एक लंबी लाइन

पूरा विश्व खतरनाक कोरोना वायरस (Coronavirus) से जंग लड़ रही है. इससे भारत भी अछूता नहीं है. संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए भारत मे 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा है. लॉकडाउन से दिहाड़ी मजदूर व फुटपाथ पर रहने वाले लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है. रोजी रोटी के कारण ये लोग पलायन करने को मजबूर हैं.

कोचिंग सिटी के साथ-साथ कोटा की औद्योगिक नगरी के रूप में भी पहचान है. यहां छोटे बड़े कई औद्योगिक इकाईयां हैं, जिनमें अन्य राज्यों के लोग काम करते हैं. लॉकडाउन के कारण कोटा की औधोगिक इकाइयां बन्द हो चुकी हैं. ऐसे में यहां दिहाड़ी मजदूरी करने वालों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा है. ऐसे हालातों में दिहाड़ी मजदूरों का पलायन रोकने के लिए कोटा का एक परिवार आगे आया है. जो पिछले पांच दिनों से रोज 1 हजार लोगों को सुबह शाम खाना खिला रहा है.

उद्योग नगर स्थित कंसुआ इलाके में रहने वाले गोपाल अग्रवाल अपने दो भाइयों के साथ इन दिहाड़ी मजदूरों की सेवा में लगे हैं. इनके घर के बाहर पिछले पांच दिनों से ऐसे ही दिहाड़ी मजदूरों की लंबी कतार लगती है. विश्वव्यापी महामारी के बीच गोपाल अग्रवाल के परिवार के 15 सदस्य जरूरतमंदों खाना बांटने में लगे हैं. इनके घर के बाहर जरूरतमन्दों की करीब 600 मीटर लंबी कतारें लगती है. खाना बाटने के दौरान गोपाल अग्रवाल सोशल डिस्टेंस का भी ध्यान रखते हैं. उन्होंने एक -एक मीटर की दूरी पर गोले बना रखे हैं. इन्हीं गोले में खाना लेने लोग कतारों में खड़े होते हैं. खाना बाटने के दौरान पहले ये लोगों के हाथ धुलवाते हैं.

गोपाल अग्रवाल ने बताया कि उद्योग नगर क्षेत्र में स्थित ज्यादातर औद्योगिक कारखाने बन्द हो चुके हैं. उनकी खुद की भी सुंदर फ्लोर मिल के नाम से आटे की मिल है जहा. से चंबल फ्रेश चक्की आटा शहर में सप्लाई होता है. इस इलाके में रहने वाले मामा-भील जो की दिहाड़ी मजदूरी करते थे. फेक्ट्री बन्द होने से वो लोग पलायन कर रहे थे. उनको समझाया गया और खाने की व्यवस्था की. लॉकडाउन के पहले दिन 400 लोगों का खाना तैयार करवाया. दूसरे दिन ये संख्या बढ़कर 800 हो गई. फिलहाल 1200-1300 पेकेट सुबह शाम बनते हैं. इस व्यवस्था के लिए 3 हलवाई, 2 भट्टियां, 7-8 महिलाएं रोज खाना तैयार करते हैं.

इस व्यवस्था पर प्रतिदिन 30 से 35 हजार का खर्चा आ रहा है. उनकी खुद की फैक्ट्री में करीब 40 से 50 वर्कर काम करते हैं. जो फैक्ट्री में ही खाना खाते हैं. उनकी खुद की फैक्ट्री में अंदर मेस चला रखी है. इसके अलावा कई लोगों को आटे के कट्टे के कूपन देते हैं. जरूरत के हिसाब से वेरिफिकेशन करके रोज 20 से 25 लोगों को 5-5 किलो के कूपन बांटते हैं. ये लोग शहर की किसी भी दुकान पर जाकर कूपन देते हैं फिर फ़ोन पर गोपाल अग्रवाल की बात करवा देते हैं. गोपाल अग्रवाल फोन में बात कर दुकानदार के ऑन लाइन पैसा ट्रांसफर्स करते हैं.

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