लॉकडाउन के समय इस गावँ के लोग इमली व गुंदा फूल की सब्जी चाव से खा रहे हैं

छूट्टी का दिन आता है और मंडी से सब्जी लाकर फ्रीज में धर देते है लेकिन अभी लॉकडाउन में सब्जी से लेकर खानपान में भी घरों में बहुत बदलाव आया है। आदिवासी क्षेत्र की बात करें तो वहां वैसे भी देसी तरीके से खाने का आनंद अनवरत दिखने को मिलता है लेकिन इन दिनों वैसी ही तस्वीर शहर में भी दिखने को मिल रही है। 
गांव में तो परिवहन के साधन बंद होने से सब्जियां पहुंच नहीं पा रही है लेकिन खेतों में जो सब्जी वहां उगाई जाती है उसे ही काम में ले रहे है लेकिन वहां अभी कच्च कैरी की चटनी पूरा समय आसानी से निकाल रही है। बात शहर की करें तो शहरों में भी इन दिनों किचन में कुछ न कुछ नया बन रहा है। बाजारों से लाई जाने वाली मिठाइया भी घर में तैयार की जा रही है। महिलाएं ही नहीं पुरुष भी इन दिनों किचन में कुछ न कुछ बनाने में लगे। 

जब भी अकाल, महामारी या भुखमरी आई तब-तब आदिवासी समाज ने प्रकृति का साथ दिया है और आसपास की वन उपज से अपने परिवार का भरण पोषण किया है। आदिवासी क्षेत्रों में लॉकडाउन के बाद खानपान की जीवन शैली के अंतर्गत खुद के खेतों में उगाई सब्जियों का उपयोग कर रहे है वही प्रकृति द्वारा उत्पादित वस्तुओं की तरफ भी रूझान बढ़ा है। इसमें कच्चे आम की चटनी, इमली के फूल की सब्जी बनाना, गुंदा के फूल की सब्जी सहजन जिसे स्थानीय बोली में हरगू फली कहते है। 

नदी में उगने वाली पत्तेदार वनस्पति जिसे नला की भाजी कहते है उसे अपने मीनू में शामिल करते हुए कठिन परिस्थितियों में ये लोग भूख शांत कर देते है। सीमित संसाधनों एवं समय के साथ जंगलो में ही रहकर जीविकोपार्जन करते है। ग्रामीण एवं जंगल इलाकों के आदिवासी समाज के लोगो को सामान एवं सब्जी खरीदने के लिए बाजार आने जाने में 20 या 30 किमी पैदल चलना पड़ता हैं। ऐसे में ये लोग एक तो बिना तेल के ही कच्ची केरी को कूटकर कड़ी बना लेते है और दूसरा मिर्च नमक में कच्ची केरी कूटकर रोटी के साथ पूरा परिवार खाना खा लेता है।