कोरोना का कहर : अपनों को खोने के गम के बीच दूसरों की चिंता, खुद कर रहे हैं आने से मना!

दुख की सबसे बड़ी घड़ी वह होती है जो कोई अपना साथ छोड़ चला जाता है। रोते-बिलखते परिजन को आस-पड़ोस और रिश्तेदारों की सहानुभूति की जरूरत रहती है, लेकिन कोरोना कहर उनके अकेले ही दुख सहने को मजबूर कर रहा है। शहर में लॉक आउन के साथ कोरोना का भय इस कदर है कि अव्वल तो लोग किसी की मौत पर बैठने भी नहीं आ रहे हैं। वहीं, जिनके घर में मौत हुई है वे भी उस गम को सहते हुए सामने से ही मना कर रहे हैं कि जब सरकार लोगों को मना कर रही है तो फिर आप नहीं आएं।
हम आपकी सहानुभूति को मोबाइल या मन से मान लेंगे। यह स्थिति शहर में पिछले कुछ दिनों में हुई मौतों को लेकर देखने को मिल रही है। शहर के रेलवे कुआं नबर तीन क्षेत्र में एक युवक की असामयिक मौत हुई। अभी पांच-सात दिन ही बीते थे कि कोरोना के चलते लॉक डाउन को गया। दूर दराज से रिश्तेदार आ नहीं पाए और शहर वाले भी नजदीक होते हुए भी दूर हो गए, क्योंकि लॉक डाउन जो है। 

ऐसे में घर के चंद लोग एक-दूसरे का सांत्वना देकर दुखी की घड़ी में गम को बांट रहे हैं। वहीं, घरवालों को भी कोरोना की भयावकता का अंदाजा है, इसलिए वे भी लोगों को कह रहे हैं कि आप नहीं आए, क्योंकि आप इसकी चपेट में आ गए तो फिर मामला बिगड़ जाएगाा। शोक संतप्त परिवार के सदस्य भी एक-दूसरे दूरी रखते हुए मुंह को ढक कर बैठे हैं।
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