लॉकडाउन : "एक दिन पूड़ी बांटे से भूखवा न मरी साहब, हमनीके रोज रोटी चाही"

प्रशासन, पुलिस के साथ ही ब्लाक स्तरीय अधिकारी, ग्राम प्रधान व आम लोगों द्वारा लॉकडाउन में गरीबों को राशन वितरण किया जा रहा है। कहीं तहरी बंटी तो कहीं लंच पैकेट बांटे गए। लेकिन लाभार्थियों का दर्द यह कहकर फूट पड़ता है कि एक टाइम चार पूड़ी खिला देने से जिदगी नहीं चल जाती। सरकार ने राशन दिया तब जाकर दोनों समय घर के चूल्हे जल रहे हैं। रोजाना मजदूरी कर पेट पालने वाला तबका इससे परेशान है।
देहात कोतवाली क्षेत्र के जोगिया बारी की अनुसूचित जनजाति बस्ती हो या हलिया ब्लाक की वनवासी बस्ती, मझवां ब्लाक में गोरही जमालपुर वनवासी बस्ती हो या नरायनपुर में बसे अनुसूचित जनजाति के लोग, इनके यहां लॉकडाउन के पहले ही दिन से राशन व भोजन बांटा जा रहा है। बुधवार को जब इनमें से कुछ स्थानों की पड़ताल की गई तो सच्चाई उलट नजर आई। अनुसूचित जनजाति की महिला गीता ने बताया कि एक दिन आए थे कुछ लोग और पैकेट बांटे। उसमें चार-पांच पूड़ियां व सब्जी थी। इतने में तो बच्चों का भी पेट नहीं भरता। एक बार भोजन बांटने के बाद दोबारा कोई नहीं दिखा। 

वहीं जमालपुर के लक्ष्मण वनवासी ने कहा कि एक दिन तहरी बंटी थी लेकिन शाम को भूखे ही सोना पड़ा। अब सरकारी राशन मिल गया है तो घरों के चूल्हे जल रहे हैं। जिला पंचायत सदस्य महेंदर वनवासी की मानें तो गरीबों को सिर्फ सरकारी राशन पर ही भरोसा है क्योंकि इससे महीने भर का खर्च चल रहा है। बाकी पैकेट बांटकर, तस्वीरें खिचने की भी होड़ मची है। उन्होंने कहा कि लोग गरीबों की मदद करें, भले ही उसका श्रेय लें लेकिन जिन्हें राशन मिले, उन्हें भरपूर मिले ताकि कुछ दिन उसके सहारे गुजर सके। महिला संतरा ने कहा एक दिन पूड़ी बांटे से भूखवा न मरी साहब, रोज रोटी चाही।
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