"हम सभी को बुला ले, नहीं तो कोरोना वायरस से नहीं, हम भूख से मर जाएंगे!" लॉकडाउन में फंसे लोगों का दर्द

लॉकडाउन की वजह से पिछले 19 दिन से परदेस की अपनी कोठरियों और झोपडी़ में फंसे छत्तीसगढ़ के मजदूरों का धैर्य जवाब देने लगा है। वे लोग राज्य सरकार से उन्हें घर लौटने की व्यवस्था देने की मांग कर रहे हैं। कर्नाटक के मेंगलूरु में भवन निर्माण का काम करने गए राजनांदगांव जिले के प्रमोद साहू ने बताया, इस इलाके में उनके जैसे 200 लोग हैं। मार्च महीने में स्थानीय प्रशासन ने एक बार 4-5 दिन तक चलने लायक राशन दिया था। तबसे कुछ नहीं मिला। कोई मदद भी नहीं मिल रही है। 
इतना हुआ है कि राशन दुकान खुलने लगी है, लेकिन वह भी सामान महंगा दे रहा है। 40-50 रुपया किलो चावल, 70 रुपया किलो आलू और 95 रुपए में मिलने वाले तेल के लिए 120 रुपए देने पड़ रहे हैं। हम लोग कोरोना से पहले भूख से मर जाएंगे। काम चलता रहता तो हम किसी के सामने हाथ नहीं फैलाते। सरकार हमारी मदद कर दे और हमें हमारे गांव पहुंचा दे। लखनऊ में फंसे कवर्धा के सुखनंदन साहू जैसे 50 लोगों तक सरकारी मदद पहुंच रही है, लेकिन लोग अपनी झोपडिय़ों में बैठकर बेचैन हैं। 

लाकडाउन बढऩे की सूचनाओं ने उन्हें निराश कर दिया है। लखनऊ में ही फंसे मुंगेली के अजय साहू के साथियों को दो दिन से भोजन नहीं मिला है। वे कहते हैं कि पुलिस वालों से मदद मांगी तो कह दिया की सामान खत्म है। सरकार ने फंसे हुए प्रत्येक मजदूर के बैंक खाते में एक हजार रुपए डालने की बात की थी, लेकिन यह राशि सभी को नहीं मिली है। लखनऊ में फंसे अजय साहू ने कहा, उनके दल में बेमेतरा के 9 लोगों को पैसा मिला है, शेष को नहीं। 

श्रम मंत्री डॉ. शिव डहरिया का कहना है, यह राशि केवल पंजीकृत श्रमिकों के खाते में ही गई है। उन्होंने कहा कि ऐसे मजदूरों को सरकार भी लाना चाहती है। इनको जांच के बाद परमिट देकर लाया जा सकता है, लेकिन इसकी अनुमति केंद्र सरकार ही दे सकती है। केंद्र सरकार का आदेश है कि जो जहां है वहीं रहे। उन राज्य सरकारों को ऐसे मजदूरों की मदद करनी चाहिए। हम उनसे संपर्क कर मदद पहुंचाएंगे।