किसानों की बल्ले बल्ले, घर पर मजदूरों की हुई दस्तक!

बांदा के लॉक डाउन से जहां एक ओर शहर लेकर सभी जगह लोग परेशान है तो वहीं ग्रामीण क्षेत्र में किसानों को इसे लेकर राहत है। किसानों माने तो गैर जिलों में मजदूरी करके अपना भरण पोषण करने वाले लोग बड़ी तेजी से गांव लौटे है। ऐसे में अब उन्हें फसल कटाई के लिए मजदूरों की समस्या से दो चार नहीं होना पड़ रहा है। एक ओर मजदूर आसानी से मिल रहे तो वहीं मजदूरी भी घटी है।
खेती-किसानी बुंदेलखंड की रीढ़ मानी जाती है। यहां बड़े कोई उद्योग है नहीं। ऐसे में खेती किसानी के जरिए ही यहां ज्यादातर वर्गों की रोजी चलती है। पिछले दो दशकों में दैवीय आपदा के चलते मजदूरों का पलायन बढ़ गया। ऐसे में मजदूर वर्ग के युवा दिल्ली, अहमदाबाद, भुज, जयपुर, कानपुर, मुंबई सहित कई शहरों में चले गए। इधर, कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए पूरे देश में 25 मार्च से लॉकडाउन घोषित कर दिया गया है। 

ऐसे में बड़ी कंपनियां व फैक्ट्रियां बंद होने के बाद हजारों की संख्या में मजदूर अपने शहर व गांव लौट आए हैं। गांवों में इस समय गेहूं, चना सहित अन्य फसलों की कटाई चल रही है। ऐसे में यहां मजदूर किसानों के घर खुद कटाई का कार्य मांगने जा रहे हैं। मजदूरों की संख्या ज्यादा होने से किसान भी मजदूरी को लेकर मोलभाव कर रहे हैं। पिछले वर्ष मजदूरों के न मिलने से किसानों ने हार्वेस्टर से फसल की कटाई कराई थी। कुछ मजदूर मिले भी तो प्रति बीघा 70 से 80 किलो की औसत से कटाई ली। लेकिन इस वर्ष कटाई के लिए किसानों को सिर्फ 50 किलो प्रति बीघा खर्च करना पड़ रहा है।
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