पिता ने काेराेना पॉजिटिव बच्चों के लिए हर काम किया, और 12 दिन में काेराेना काे हराकर घर लेकर आए

हनुमान भाखरी नई सड़क पर रहने वाले लक्ष्मण प्रजापत और परिवार के तब होश फाख्ता हो गए, जब वे स्वयं, उनका ढाई साल का बेटा हितेश और चार साल की कल्पना कोरोना संक्रमित हो गए, जबकि 8 साल का बेटा नैतिक पहले से ही कोरोना की जंग लड़ रहा था।
हालांकि बच्चों की मां सपना प्रजापत ने निगेटिव होने के बावजूद बच्चों की देखरेख करने के लिए साथ जाने की जिद की, लेकिन लक्ष्मण ने पूरा भरोसा दिलाया कि चिंता नहीं करें, वे उन्हें कोरोना से उबरने में पूरी मदद करेंगे और एक मां के भी सारे कर्तव्य निभाएंगे। ऐसा करके भी दिखाया और 12 दिन तक हॉस्पिटल में पिता के साथ-साथ मां के भी सारे कर्तव्य निभाए और बच्चों को कोरोना की जंग जितवाकर घर लाए। वे कैसे संक्रमित हुए और कैसे उन्होंने दोनों मासूमों की देखभाल की।

लक्ष्मण बताते हैं कि 4 मई को खुद और उनकी चार साल की बेटी कल्पना, ढाई साल का बेटा हितेश भी पॉजिटिव आ गए। मेरी और मेरी पत्नी की हालत खराब हो गई। कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या करें? इतने छोटे बच्चों को कोरोना का सुनकर हाथ-पैर फूल गए। पत्नी ने कहा कि वे भी साथ चलेंगी, भले ही निगेटिव है। मैंने इनकार कर कहा कि बच्चों की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ूंगा।

हमारे ढाई महीने का बच्चा मयंक भी है। वह बगैर मां के रह नहीं सकता है और वह निगेटिव है। अगर मेरी पत्नी सपना साथ चलती तो उसे भी संक्रमण का खतरा रहता। हमें जिस वार्ड में रखा, उसके सामने के वार्ड में मेरी मम्मी और बेटा नैतिक था। वे हमसे छह दिन पहले से वहां थे और काफी रिकवर हो गए थे, इसलिए केवल दूर से देखते और इशारों में कुशलक्षेम पूछ लेते थे। 13 मई को उन्हें डिस्चार्ज करने की माइक पर घोषणा हुई, तब गाड़ी में बैठकर जाते हुए देखा और हाथ हिलाकर विश किया।

लक्ष्मण बताते हैं कि उनके पापा ने कोरोना जांच कैंप में 17 अप्रैल को सैंपल दिया था। एक सप्ताह तक रिपोर्ट नहीं आई तो हम निश्चिंत हो गए कि निगेटिव हैं, इसलिए रिपोर्ट नहीं आई होगी। दूसरे दिन ही कॉल आया कि पापा पॉजिटिव हैं और मेडिकल टीम उन्हें एमडीएम अस्पताल लेकर गई। पूरे परिवार को कुड़ी में क्वारेंटाइन किया गया। 29 अप्रैल में आई रिपोर्ट में मम्मी, मेरा 8 साल का बेटा, भतीजा और भाई की पत्नी भी पॉजिटव आए।