साहब! मेरे 8 माह के बच्चे ने दम तोड़ दिया है और वह अब इस दुनिया में नहीं रहा, सुनते ही DM की आंखों से बहने लगे आंसू

कोरोना वायरस महामारी ने भारत में गरीबों और मजदूरों की कमर तोड़ कर रख दी है। कई मजदूर बेघर हो गए तो कईयों का रोजगार छीन गया। लॉकडाउन के कारण जब सारा कारोबार ठप्प हो गया तो ये मजदूर अपने अपने घर पलायन करने को मजबूर हो गए। लॉकडाउन के बाद देश भर से पलायन की ऐसी कई तस्वीरें देखने को मिल रही हैं, जो उनका दर्द बयां कर रही हैं। बड़े शहरों से मजदूरों की कई ऐसी कहानियां आई, जिसे सुनकर कोई अपने आंसू नहीं रोक सकता। ऐसी ही एक दर्दनाक कहानी पिछले दिनों पूर्वी दिल्ली से आई, जिसे सुनने के बाद प्रशासन के अधिकारियों तक के आंसू निकल पड़े। आइये जानते हैं कि आखिर क्या है वो कहानी…

मुझे पैदल ही बिहार जाने दो…
बिहार के एक मजदूर ने अपनी दर्दनाक कहानी जिलाधिकारी को सुनाई। आप भी सुनिए वो कहानी, ‘साहब मेरे पास कोई बड़ी गाड़ी नहीं है और न ही साइकिल। साहब मेरे आठ माह के बच्चे ने दम तोड़ दिया है और वह अब इस दुनिया में नहीं रहा। उस बच्चे को पाने के लिए मैंने बिहार के कई बड़े मंदिरों में जाकर माथा टेका था और आठ साल तक ईश्वर से मैंने बच्चे के लिए प्रार्थना की तब जाकर मुझे एक बेटा मिला था। मेरे पास कोई पैसा नहीं है, जो मैं आपको दे सकूं और आप मुझे बिहार पहुँचा दो। मैं अपने बच्चे का चेहरा भी नहीं देख पाया। जिलाधिकारी से गुहार लगाते हुए मजदूर कहता है, साहब मुझे पैदल पैदल ही बिहार जाने दो। मैं आपसे कोई साधन नहीं मांग रहा हूँ। मुझे पैदल ही जाने दो, ताकि मैं इस मुश्किल घड़ी में अपने पत्नी को सहारा दे सकूं।

जिलाधिकारी ने मजदूर को ट्रेन से भेजा बिहार
बिहार के बेगूसराय जिले के रहने वाले राम पुकार की इस कहानी को सुन कर प्रशासन के कई अधिकारियों के आखों में आंसू आ गए। इसके बाद जब यह मामला जिलाधिकारी अरूण कुमार मिश्र के संज्ञान में आई तो उन्होंने उस मजदूर की स्थिति का पता लगाने को कहा और उसका पता चलते ही पहले एहतियातन उसकी स्क्रिनिंग करवाई गई। इसके बाद बुधवार को राम पुकार के लिए नई दिल्ली से बिहार जाने वाली स्पेशल ट्रेन में सीट का इंतजाम कराया गया और उसे बिहार भेजा गया। आपको बता दें कि खुद एसडीएम संदीप दत्त ने मजदूर को नई दिल्ली स्टेशन तक पहुँचाया, इतना ही नहीं एसडीएम द्वारा उसके खाने पीने की व्यवस्था भी की गई।

तीन दिन तक भूखे प्यासे सड़क पर दर दर ठोकरें खाई

गौरतलब हो कि राम पुकार बिहार के बेगूसराय जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि, वो दिल्ली के नजफगढ़ में मजदूरी करके अपना गुजर बसर करते हैं। राम पुकार की पत्नी और दो बेटियां बिहार में ही रहती हैं, अभी आठ महीने पहले ही राम पुकार की पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया था। कुछ ही दिन पहले बच्चे की तबियत काफी खराब थी, पत्नी लॉकडाउन और आर्थिक तंगी की वजह से बच्चे का इलाज नहीं करवा सकी। उपचार नहीं मिलने के कारण बच्चे की तीसरे दिन मौत हो गई। 
रामपुकार ने बताया कि मेरी आर्थिक स्थिति काफी खराब है, इसलिए मैं ट्रेन से बिहार तक नहीं जा सकता हूँ। इसलिए मैं बिहार पैदल ही निकल गया था, लेकिन दिल्ली यूपी गेट से आगे पुलिस ने जाने नहीं दिया। रामपुकार ने बताया कि वो दिन तक वहीं सड़क पर भूखे प्यासे ही पड़े रहे। इसके बाद राम पुकार ने अपनी परेशानी एक पुलिसवाले को बताई, पुलिसवाले ने जिलाधिकारी से राम पुकार की बात कराई। फोन में राम ने जिलाधिकारी से कहा कि साहब आपको भगवान की कसम है मेरा बेटा मर गया है, मुझे किसी भी हालत में बिहार भेज दो। इसके बाद जिलाधिकारी ने मजदूर की विवशता को समझते हुए उसके जाने का इंतजाम कराया। ये बात सच है कि एक पिता कभी अपना दर्द सामने आने नहीं देता, लेकिन पिता भी आखिर एक इंसान ही होता है।