9 महीने की प्रेग्नेंट पत्नी के साथ पुणे से पैदल छत्तीसगढ़ लौट रहा है मजदूर परिवार

लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों का पलायन जारी है
9 महीने की प्रेग्नेंट महिला पैदल पुणे से छत्तीसगढ़ जा रही
पुणे के बाहरी क्षेत्र वागोली फाटा में सैकड़ों प्रवासी मजदूर प्राइवेट बस के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, जो उन्हें गृह राज्यों में उनके घरों तक ले जाएं. कितना किराया लगेगा ये भी प्राइवेट बसों के बाहर बोर्ड पर लिखा हुआ है. लेकिन हर किसी के लिए इसका किराया भरना आसान नहीं है. सरकारी एजेंसियों का दावा है कि जो प्रवासी मजदूर घर वापस जाने के लिए अपने मूल राज्य लौटना चाहते हैं, उन्हें बस, ट्रेन जैसे साधन मुफ्त उपलब्ध कराए जा रहे हैं.लेकिन पुणे- अहमदनगर हाईवे पर मीडिया ने ऐसे कई प्रवासी मजदूर देखे जो सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करने के लिए पैदल ही निकले हुए हैं.
ऐसे ही दर्जन भर लोगों के एक जत्थे में एक प्रेग्नेंट महिला भी सिर पर प्लास्टिक का बड़ा कैन उठाए चलती दिखाई दी. साथ में एक छोटा लड़का भी पानी की बोतल उठाए चल रहा था. ये सभी लोग मूल रूप से छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं और लॉकडाउन शुरू होने से पहले तक पुणे के चाखंड इलाके में दिहाड़ी मजदूरी कर रहे थे. प्रेग्नेंट महिला के पति के मुताबिक पैदल छत्तीसगढ़ लौटने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था. इस शख्स ने कहा, “मेरी पत्नी नौ महीने के गर्भ से है. न पैसा बचा और न ही कुछ खाने को. किराना दुकानदार ने आगे उधार पर खाने का सामान देना बंद कर दिया.”

इस शख्स के मुताबिक सरकारी साधन से जाने के लिए कागजात भरे लेकिन इंतजार खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था. न ही अधिकारियों की ओर से कोई पुष्टि की जा रही थी. ऐसे में उन्होंने पैदल ही छत्तीसगढ़ लौटने का फैसला किया. जत्थे के अन्य सदस्यों ने बताया कि कुछ वाहन वालों से उन्होंने ले चलने की गुजारिश की लेकिन किसी ने नहीं सुनी. और कुछ ने इतने पैसे की मांग की जो बूते में ही नहीं था. ये लोग पुणे के चाखंड इलाके में काम करते थे, वहां ठेकेदार ने उन्हें पैसा देना भी बंद कर दिया. लॉकडाउन से पहले वो दिन में पांच सौ रुपये तक कमा लेते थे. 
मजदूरी बंद हो जाने के बाद वो खाने के लिए भी सरकार या एनजीओ से मिलने वाली मदद के भरोसे हो गए. इन लोगों का कहना है कि जब वो ऐसी बातें सुनने लगे कि लॉकडाउन लंबा चलेगा तो उनका सब्र जवाब दे गया. इस जत्थे की तरह ही पुणे-अहमदनगर हाइवे पर सैकड़ों लोगों के कदम पैतृक जगहों की ओर लौट रहे हैं. हर किसी के पास सुनाने को अपनी दुख भरी कहानी हैं. लेकिन इनकी कब और कौन सुनता है, ये सवाल अहम है.