लॉकडाउन में थम गईं सांसें और अधूरा रह गया सफर... किसी को क्या पता था, रास्ते में बहाना पड़ेगा खून

हरियाणा और पंजाब की अर्थव्यवस्था को अपने पसीने से सींचने वाले बिहार और पूर्वांचल के मजदूरों का दुख किसी को नहीं दिखा। वे मालिकान, जिनके लिए रात-दिन एक कर दिया, उनके लिए दो माह की रोटी का भी इंतजाम न कर पाए। सरकारों ने भी साथ न दिया तो खुद के भरोसे निकल पड़े हजारों किलोमीटर के सफर पर, लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि इस सफर में खून भी बहाना पड़ेगा। बृहस्पतिवार को रोहाना हादसे के बाद बड़ी संख्या में बिहार और पूर्वांचल के जिलों के श्रमिक बसों से घर जाने की उम्मीद में रोडवेज बस स्टैंड पहुंच गए। 
बिहार के अररिया जिले के मोहम्मद तकसीर और सरताज व्यवस्था से बेहद खिन्न दिखे। बोले, साहब हफ्तों की दौड़-भाग के बाद जब किसी ने नहीं सुनी तो पैदल ही निकल पड़े। मुजाहिद ने बताया कि वे प्लाईवुड फैक्टरी में काम करते थे। काम बंद होने के बाद कुछ दिन तो मालिक ने खाना उपलब्ध कराया, इसके बाद गायब हो गया। अब वहां रुककर भला क्या करते। मोहिद्दीन और जुबैर कहते हैं कि मजदूर का कोई नहीं होता। न तो मालिक और न ही सरकारें। अंबाला से आ रहे बिहार के औरंगाबाद जिले के मुनेश सहित करीब 15 मजदूर पुरकाजी के रास्ते से मुजफ्फरनगर पहुंचे।
उन्होंने बताया कि उन्हें रोहाना में हुए हादसे की जानकारी मिली है। पता नहीं घर पहुंचने के लिए क्या-क्या कीमत चुकानी पड़ेगी। कितनों का खून बहेगा। वे अंबाला क्षेत्र में किसानों के यहां काम करते थे। किसान तो रोकना चाहते थे लेकिन अब घर जाने में ही भलाई है। जो सपने और उम्मीदें लेकर आए थे वे तो खत्म हो गई। अब अपने इलाकों में ही जाकर कुछ काम धंधा करेंगे। श्रमिक खाने-पीने के लिए दूसरों की दया पर निर्भर हैं। रास्ते में किसी ने कुछ दे दिया तो खा लेते हैं। कभी-कभार नमक डालकर चावल उबाल लेते हैं। उसी से पेट की आग बुझाते हैं और चल पड़ते हैं।
श्रमिकों का कहना था कि उनकी जिंदगी भी रामभरोसे हैं। कस्बे में पानीपत खटीमा राजमार्ग पर बृहस्पतिवार सुबह बिहार प्रांत को अपने घर जाने वाले प्रवासी श्रमिकों की लंबी लाइन थी। बिहार प्रांत के जिला अररिया कटिहार व सहरसा निवासी श्रमिक राघव यादव, विनोद, सतनाम, विश्वनाथ, इस्लाम, रमेया आदि ने बताया कि उनको सरकार की ओर से कोई सुविधा नहीं मिली है।