जीवन के खेल ही तमाशे, जोर लगा मेरे भाई! मां और माैसी का सवाल है

तमाशा दिखाने वाले इस परिवार की जिंदगी को भी लॉकडाउन ने तमाशा बनाकर रख दिया है। वक्त ने ऐसा रुख बदला कि नौ साल के सैयद को मां और उसके गर्भ में पल रही नन्हीं सी जान के लिए नंगे पांव भोजन की तलाश में निकलना पड़ गया। स्कूल जाने की उम्र में जिम्मेदारियों का भार लद गया है। नंगे पांव थकने का नाम नहीं ले रहे। मां के आंचल में पल रहे अंश का भी तो ख्याल रखना है। 
इसे मजबूरी कहें या मां की ममता, छाले भी पड़ जाए तो भी परवाह नहीं। बस मां और गर्भ में पल रहे भविष्य को कुछ नहीं होना चाहिए। इन शब्दों को समझने में भले ही सैयद की उम्र बहुत छोटी है, लेकिन उसके चेहरे का मनोभाव शायद यही कह रहा है। गोविंदपुर के पलटनटांड़ (अमलाटांड़) का नौ साल का सैयद मंगलवार को गोविंदपुर-साहिबगंज रोड पर नंगे पांव एक तीन पहिया ठेला खींचता मिला। ठेले पर आठ माह की गर्भवती मां मुनैशा खातून भी लेटी हुई थी। 

पूछने पर पता चला कि राशन की तलाश में गांव-गांव भटक रहे हैं। अभी तक एक-दो जगह ही राशन मिला। पेट की आग बुझानी है, इसलिए पूरा परिवार हर दिन इसी उम्मीद में निकलता है कि दो वक्त की रोटी नसीब हो जाएगी। ठेले के साथ पांच साल का छोटा भाई इबरान भी बड़े भाई की मदद करता है। पिता मो. निजाम दूसरे गांव में राशन की तलाश में गए हुए हैं। मां पैदल चल नहीं सकती, इसलिए बड़े बेटे ने ठेले पर खींचने की जिम्मेवारी उठा ली। 

सैयद की मां के साथ उसकी मौसी शहाना भी सात माह की गर्भवती है। दोनों भाई सैयद और इबरान मां एवं मौसी को ठेले पर बिठाकर मंजिल की ओर बढ़ चले। जिन्होंने भी रास्ते में यह नजारा देखा दोनों भाइयों के जज्बे को सलाम किए बिना नहीं रह सका। तमाशा दिखाकर परिवार करता था गुजर बसर सैयद की मां मुनैशा खातून ने बताया कि सैयद के पिता पास के ही गांव में राशन की व्यवस्था करने गए हैं। हम लोग बच्चों के साथ अगले गांव में जा रहे हैं। जहां से भी राशन मिल जाए। हमारा पुश्तैनी काम तमाशा दिखाना है। 

सैयद के पिता और हमारे परिवार का हर सदस्य जगह-जगह घूमकर पिछले 25 वर्षो से तमाशा दिखाते आए हैं। हमारे पास पहले भालू हुआ करता था, लेकिन 2006 में सरकार ने भालू के साथ तमाशा दिखाने पर रोक लगाते हुए भालू जब्त कर लिया। इसके बाद खुद ही तमाशा के कलाकार बन गए। जबसे यह बंदी हुई है हमारा यह रोजगार भी छिन गया। अब तो खाने को लाले पड़ गए हैं। बच्चों की यह हालत देखी नहीं जाती, पर क्या करें पेट की भूख का सवाल है बाबू।