माँ बाप नहीं तो इन बेसहारा मासूमों का सारथी कौन होगा...

जीवन में माता-पिता का साथ बच्चों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के साथ उनका भविष्य तय करता है। मां-बाप के साए में पले-बढ़े बच्चे स्वयं को आनंदमय पाते हैं, उन्हें पता नहीं चलता कि कब मां-बाप के आंचन की छांव में उनका जीवन मुकाम तक पहुंचकर रोशन हो गया। इस अवधि में मां-बाप की छत्र-छाया उनके जीवन से उठ जाए तो जीवन अनाथ और अंधकारमय हो जाता है। ऐसे में अबोध बच्चों को अनाथ की संज्ञा मिलती है। ऐसे में इन बच्चों के पालन- पोषण के लिए सारथी की जरुरत है। इस स्थिति में बच्चों को प्यार-दुलार और अपनत्व देने वाला कोई व्यक्ति नजर नहीं आता, तब इनका जीवन और कष्टदायी होता है। 
ऐसा ही भुसावार के गांव निठार में हुआ, जहां बिन मां-बाप तीन बच्चों को बिलखते देखा गया। क्योंकि बीमारी ने एक-एक दिन के अंतराल में समय ने इनके मां-बाप को छीन लिया। इसलिए ये बच्चे अब बेसहारोंं की दहलीज पर खड़े हैं। अब यह दया पर निर्भर हैं, क्योंकि इन बच्चों के अपने इनका साथ छोड़कर हमेशा के लिए अलविदा कह गए। गांव निठार के खूबी राम ने बताया कि गरीबी पहले से थी ऊपर से बीमारी ने जकड़ लिया। इससे 12 मई को मां संतोषी देवी और 13 मई को पिता सुरेंद्र बच्चों को अकेला छोड़ चल बसे। 

परिवार की इतनी दयनीय स्थिति थी कि दोनों के दाह संस्कार के लिए पैसा नहीं था और न कोई देखने वाला। ऐसे में गांवा वासियों ने दाहसंस्कार किया। रोते बिलखते बच्चों को कहीं से उम्मीद नहीं थी। तब खूबीराम ने सहारा दिया। जहां गुमशुम बच्चों को प्यार से राहत मिली। उन्होंने बताया कि अब परिवार में कोई भी बच्चों को संभालने वाला नहीं है। जब मां-बाप बीमार थे तो परिवार के मुखिया पिता दिव्यांग भी थे, लेकिन परिवार चलाने के लिए बीमारी की हालात में मार्बल पत्थर का काम कर गुजारा करना पड़ा। 

तबीयत अधिक खराब होने पर एक निजी स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के तौर पर कार्य किया। पैसे की तंगी में बीमारी को और हावी हो गई। दूसरी और पत्नी संतोष देवी भी बीमार थी। ऐसे में पत्नी गत 12 मई को चल बसी। उसके वियोग में बीमार पति भी 13 मई को दुनिया को अलविदा कह गया। इसका दाहसंस्कार भी गावंवासियों ने किया। इस स्थिति में बच्चे अब बेसहारा हो चुके हैं। अब इन्हें लोगों के साथ सरकारी तंत्र के सहारे की जरुरत है। सरकार अगर सहायता करे तो इनका जीवन संभल सकता है।