लॉकडाउन में अब पूरा गांव फिर से बनाने लग गया है गुड़

कोरोना वायरस के चलते लगभग दो माह से लॉकडाउन चल रहा है। इससे कई लोगों की आजीविका छिन गई है, तो कई लोगों ने अपने पुराने पेशे की जगह लॉकडाउन में नया पेशा अपना लिया है। पहले जम्मू, सांबा आदि जिलों में चार माह तक चौक-चौराहों और गलियों में रेहड़ी लगाकर लोग गन्ने का रस बेचते थे। लॉकडाउन में गन्ने का रस का व्यापार बंद होने से किसानों के खेतों में गन्ने की फसल बर्बाद हो रही है। ऐसे में गन्ने का रस बेचने वालों ने गुड़ बनाना शुरू कर दिया। इस समय सांबा जिले में कई लोग गन्ने का गुड़ बना रहे हैं। इससे उनको रोजगार भी मिल गया और किसान भी अपना गन्ना उनको बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं।
सांबा के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित ललाली गांव में सभी 20 परिवार गन्ने की खेती करते हैं। गांव के बुजुर्ग मोहन लाल ने बताया कि उनके पिता भी गन्ना लगाते थे। उस समय बैल कोल्हू खींचते थे, तब रस निकलता था। इसी से गुड़ बनाया जाता था। पहले ज्यादातर लोग गुड़ ही बनाते थे, गन्ने के रस की मांग कम थी। अब फिर से लॉकडाउन में गुड़ का काम बढ़ गया है। हरबंस लाल ने बताया कि हर वर्ष मोर्च माह में वह अपनी रेहड़ियों को लगा देते थे और फिर बरसात के शुरू होते तक उनका काम चलता रहता था। 

इस बार जब उनका गन्ना तैयार हो चुका था तो उस समय एकाएक कोरोना बीमारी आ गई और फिर लॉकडाउन शुरू हो गया। ऐसे में वे भी अब गुड़ बनाते हैं। रस बेचने से होती थी अच्छी कमाई, गुड़ से गुजर-बसर हो जाएगा। ललाली गांव निवासी दर्शन कुमार ने कहा कि गन्ने का रस बेचने से उन्हें अच्छी कमाई हो जाती थी। उससे वह अपने बच्चों की शिक्षा के खर्चे भी निकाल लेते थे। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के चलते उनकी रेहड़ियां नहीं लग पाईं, ससे उन्हें मजबूर होकर गन्ना खेतों से काटना पड़ा, क्योंकि यह पूरी तरह से तैयार था। अगर वह गन्ना नहीं काटते तो अगली खेती भी खराब हो जानी थी। उन्होंने कहा कि अब गन्ना काटने के लिए उन्हें मजदूर लगाने पड़ जाते हैं और गुड़ का खर्चा ही इतना अधिक हो जाता है कि पैसे पूरे भी नहीं होते हैं।