लॉकडाउन में मासूम बोले "नहीं बिनेंगे कूड़ा-कबाड़ा तो अम्मी खोल नहीं पाएगी रोजा"

जहां पूरा देश लॉक डाउन के कारण बंद पड़ा हुआ है। वहीं पर कुछ लोग अपने पेट की आग बुझाने के लिए दर-दर की ठोकर खाकर कबाड़ा बीन कर अपने परिवार का भरण पोषण करते नजर आ रहे हैं। एक ओर समाजसेवी अपने आपको जनता का सच्चा हितैषी बता कर वाहवाही लूटने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं कुछ लोग अभी भी भुखमरी की कगार पर बने हुए हैं।  
वह किसी की भी परवाह न करते हुए अपना व अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए जिंदगी से लड़ रहे हैं। उन्हें यह डर नहीं है कि यह कदम उनके लिए कितना खतरनाक साबित हो सकता है। मगर पेट की आग बुझाने के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी को ही दांव पर लगा दिया है। शहर में कुछ बच्चे कूड़ा बीनते हुए नजर आए। जब उनसे जानकारी लेनी चाही गई तो कहा कि वह अपने व परिवार की पेट की आग बुझाने के लिए कबाड़ा बीन कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे है।

उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह बीमारी कितनी खतरनाक है और यदि वह इसकी चपेट में आ गया तो उसका क्या हश्र होगा। मगर वह बेखौफ होकर गंदे स्थानों से कबाड़ा एकत्रित कर अपने व परिवार के लिए रोजी रोटी की जुगाड़ कर रहा है। जमाल शाह निवासी आजाद व नदीम ने बताया कि कि उनके पास ना तो आधार कार्ड है और ना ही राशन कार्ड है, जिससे कि उन्हें सरकार द्वारा उपलब्ध कराया जाने वाला राशन मिल सके। इसलिए वे कूड़ा आदि बीन कर अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं।

मासूम आजाद ने बताया कि वह कबाड़ा आदि बीनकर अपने घर में सब्जी व अन्य चीजों का इंतजाम करते हैं। तब जाकर उन्हें कहीं रोटी नसीब होती है। नदीम ने बताया कि उनके पिता एक होटल में रोटी बनाने का काम करते थे, लेकिन अब होटल बंद हो गए हैं। इसलिए उनके पिता का काम भी नहीं चल पा रहा है। अब वह कबाड़ा बीन कर अपने घर का खर्च उठा रहे हैं। साथ ही यह भी बताया कि जब वह कबाड़ आदि बिनकर घर जाते हैं, तो उससे जो आमदनी होती है उसके बाद अम्मी का रोजा खुलता है। इस स्थिति में उनके पास कबाड़ा बीनने के अलावा कोई भी चारा नहीं बचा है।