लॉकडाउन में पानीपत से लौटे मायूस, अब कैसे करेंगे बहना की शादी...

पानीपत में मेहनत और हुनर की जुगलबंदी से कालीन की बुनाई कर रहे थे। हसरत थी कि हर महीने गृहस्थी में कंजूसी कर बहन के हाथ पीले करने भर के पैसे जुटा लेंगें, लेकिन कोरोना इन हसरतों के सामने दीवार बन आ खड़ा हुआ। फिर भी हिम्मत नहीं हारी, लेकिन लॉकडाउन एक, दो और फिर तीन बार बढ़ता ही गया तो हिम्मत जवाब दे गई। मायूसी के साथ कदम घर लौटने लगे।
यह कहानी है कन्नौज के जलालाबाद के गांव मूसा निवासी युवक की जो एक साल की बेटी की अच्छी परवरिश के बजाय अपनी बहन की शादी का खर्च जुटाने को पानीपत में मेहनत कर रहा था। शनिवार को रेलवे तिराहे के पास पीठ पर बैग टांगे युवक गुरसहायगंज जाने का साधन पूछ रहा था। साथ चल रही पत्नी की गोद में एक साल की बेटी थी। युवक में बताया कि वह इसी साल पानीपत गया था।

कालीन की बुनाई में घर खर्च के बाद 6-7 हजार रुपये बचा लेते थे। यह पैसा अपनी 19 साल की बहन की शादी के लिए जोड़ रहे थे। काम शुरू न होने की उम्मीद से दो दिन पहले पानीपत से चल दिए। कहीं वाहन मिला तो कहीं पैदल चलना पड़ा। चिंता इसकी कि बहना की शादी कैसे होगी।