हाय रे कोरोना! जेब में एक भी रुपये नहीं और बच्चे हैं भूखे

कोरोना की आफत ऐसी टूटी कि तमाम लोगों का रोजगार चला गया। आज हालात ये हो गए हैं कि वे भूखे सोने को मजबूर हैं। कभी खाना का बंदोबस्त हो गया तो बच्चों का पेट भरकर खुद भूखे ही सो जाते हैं। ऐसी ही दुख भरी दास्तान है अहमदाबाद से विशेष ट्रेन से कानपुर और फिर वहां से फर्रुखाबाद पहुंचे एटा निवासी एक परिवार की। गुरुवार रात यहां पहुंचे परिवार को एटा के लिए बस के इंतजाम का इंतजार है।
जिला एटा के रहने वाले राजेश पिछले पांच वर्ष से अहमदाबाद में एक फैक्टरी में नौकरी कर रहे थे। पत्नी सुधा, बच्चों राज, दिव्या और अमन के साथ जिंदगी का पहिया हंसी खुशी चल रहा था। अचानक कोरोना संकट ने उसकी खुशियों पर ग्रहण लगा दिया। फैक्टरी भी बंद हो गई। पूरे परिवार के साथ किराये के मकान में लॉकडाउन हो गए।

पहले चरण तक तो राशन की कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन दूसरे व तीसरे चरण का दर्द वे जीवन में भूल नहीं पाएंगे। वे बताते हैं कि इस दौरान कई रात वह और पत्नी बच्चों को खाना खिलाकर खुद भूखे ही सो जाते थे। जब यूपी सरकार ने प्रवासी मजदूरों को लाने की बात कही तो आस जग गई। ट्रेन से अहमदाबाद से कानपुर तो आसानी से आ गए लेकिन दो दिन बस के लिए बस अड्डे पर ही बैठना पड़ा। ट्रेन में एक टिकट के 695 रुपये लिए गए और बच्चों की आधी आधी टिकट बनी थी। 

सारे रुपये खत्म हो गए। कानपुर में प्रशासन से मिले भोजन के पैकेेट के सहारे ही भूख मिटाई। पत्नी ने अपना भोजन आधा ही खाया और आधा बच्चों को खिलाया। गुरुवार रात कानपुर से बस फर्रुखाबाद आ गई। अब सौ किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए प्रशासन कब वाहन मुहैया कराएगा पता नहीं। रोडवेज बसों से आए अन्य यात्रियों को क्वारंटीन सेंटरों पर भेज दिया गया।