अब हम नहीं जाएंगे मुंबई, अब किसी तरह से यहीं पर करेंगे काम

हर मां-बाप का सपना होता है कि उसके बच्चे पढ़-लिखकर किसी मुकाम पर पहुंचें। बच्चों का भविष्य बनाने के लिए मां-बाप हर तरह का जतन करते हैं। अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य बनाने की हसरत लिए जिले के मुरहू प्रखंड अंतर्गत गानालोया पंचायत के विरमकेल गांव निवासी रोहित मांझी इसी वर्ष जनवरी माह में मुंबई काम करने गया था। लॉकडाउन की इस विषम परिस्थिति ने उसे वापस खूंटी लौटने को विवश कर दिया। विरमकेल गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में क्वारंटाइन में रह रहे 38 वर्षीय रोहित मांझी ने रविवार को जागरण प्रतिनिधि को अपनी पीड़ा से अवगत कराया।
उसने बताया कि मुंबई के भिवंडी में एक कपड़ा मिल में वह काम कर रहा था। काम शुरू किए मात्र एक महीना 21 दिन ही हुए थे कि लॉकडाउन हो गया। फलस्वरूप मिल में काम बंद हो गया। वह जहां रहता था उसके पास ही झारखंड के चतरा व रामगढ़ आदि क्षेत्र के कामगार भी रहते थे। बार- बार लॉकडाउन की अवधि बढ़ने के कारण जमा पूंजी खत्म होने लगी। इस पर हम सभी कामगारों ने वापस अपने घर लौटने का निर्णय लिया। चूंकि मेरे पास पैसे खत्म हो गए थे इसलिए मैंने घर से छह हजार रुपये मंगवाए। इसके बाद हम लोगों ने 4600 रुपये की दर से 15 नई साइकिलें खरीदीं। दो पुरानी साइकिलें पहले से थीं। 

इस प्रकार 17 साइकिलों से हम 21 लोग गत 24 अप्रैल की रात दो बजे मुंबई से अपने घर के लिए निकल पड़े। साइकिल खरीदने के बाद मेरे पास जो 1500 रुपये बचे थे उससे एक पेटी बिस्कुट और एक पेटी पानी खरीदा। साइकिल से लौटने के दौरान महाराष्ट्र में तो अक्सर खाना मिल जाता था, लेकिन छत्तीसगढ़ व झारखंड में हमें कहीं भी भोजन नहीं मिला। हमारे पास जो पैसे बचे थे उसी से हम लोगों ने कहीं-कहीं ढाबे में खाना खाया। गत आठ मई को गुमला के रास्ते सुबह दस बजे मैं अपने गांव पहुंचा। गांव पहुंचने पर कुछ एएनएम आईं और मेरी स्वास्थ्य जांच करने के बाद मुझे आंगनबाड़ी केंद्र में रहने को कहा। तबसे मैं यहीं रह रहा हूं। मैं गांव में अपने बच्चों तक से अभी नहीं मिल रहा हूं, क्योंकि मुझे कोरोना के खतरे का पता है।

रोहित ने बताया कि उसके दो बच्चे हैं। बड़ी लड़की नौवीं में और छोटा बेटा पांचवीं में पढ़ता है। दोनों बच्चे खूंटी के स्प्रिंगडल्स पब्लिक स्कूल में पढ़ रहे हैं। मैं खूंटी के तोरपा रोड स्थित पीपल चौक में किराए के मकान में अपने परिवार के साथ रहता हूं। मेरी आíथक अवस्था बहुत अच्छी नहीं है। बच्चे ऊंची क्लास में पहुंच रहे हैं, इसलिए खर्च बढ़ रहा है। बच्चों की शिक्षा अच्छे से अच्छी हो सके इसी उद्?देश्य से मैं मुंबई की कपड़ा मिल में काम करने गया था लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर है। अब मैंने निश्चय कर लिया है कि वापस मुंबई नहीं जाऊंगा। कहीं से लोन की व्यवस्था यदि हो जाती है तो मैं गांव में ही कुछ गाएं पालकर खटाल खोल लूंगा। गौ-पालन वैसे भी हमारा पुश्तैनी धंधा है।